
कितने युद्ध हुए जग में,
इतिहास यही बतलाता है।
जो भी नफरत बोता है,
अंत में पछताता है।
टूटे घर और रोते बच्चे,
युद्ध की पहचान बने।
जीत के शोर में भी अक्सर,
दर्द के ही गान बने।
अगर प्रेम की राह पकड़ें,
तो जग सुंदर हो जाएगा।
मानवता का दीप जलेगा,
हर दिल उजाला पाएगा।
आओ मिलकर यह ठानें,
अब युद्ध नहीं दोहराएंगे।
शांति और भाईचारे से,
नया इतिहास बनाएंगे।
युद्ध की कीमत
जब युद्ध की ज्वाला जलती है,
धरती का दिल भी रोता है।
जिसे लोग कहते हैं विजय,
वह भी कितने आंसू बोता है।
सीमा पर जब रण सजता है,
वीरों का साहस जागता है।
पर किसी मां का आंचल तब,
चुपके से सूना हो जाता है।
शहरों की रौनक बुझ जाती,
खामोशी गलियों में आती।
जीत की धुन में अक्सर ही,
मानवता हार सी जाती।
काश समझ ले यह संसार,
नफरत से कुछ भी नहीं मिलता।
प्रेम और शांति की राहों में,
जीवन का सच्चा सुख खिलता।
युद्ध के विरुद्ध मानवता (ओजपूर्ण कविता)
जब-जब धरती पर युद्ध की ज्वाला धधकती है,
मानवता की सांसें भी सहम-सहम कर चलती हैं।
सीमाओं की जिद में जलते हैं घर और आंगन,
मासूम आंखों की नींद अचानक ही पलती है।
बारूद की गंध से भर जाता है सारा गगन,
नदियों का जल भी जैसे आंसू बनकर बहता है।
विजय के नारे चाहे कितने ऊँचे क्यों न हों,
हर शोर के पीछे एक घर चुपचाप सिसकता है।
किसी मां का बेटा रणभूमि में गिर जाता है,
किसी बहन की राखी सूनी रह जाती है।
किसी पत्नी की मांग का सिन्दूर उजड़ जाता,
किसी बच्चे की हंसी भी चुप हो जाती है।
सोचो ज़रा, यह कैसी जीत का उत्सव होगा,
जब इंसानियत ही हार के आंसू रोती है।
इतिहास भी ऐसे क्षणों में मौन खड़ा रहता,
जब सत्ता की चाह में मानवता खोती है।
आओ मिलकर यह प्रण आज फिर से दोहराएं,
नफरत की हर दीवार को मिलकर गिराएंगे।
प्रेम और करुणा के दीप जलाकर जग में,
शांति का सुंदर सवेरा फिर से लाएंगे।
धरती की यही पुकार है हर एक मानव से,
युद्ध नहीं, अब शांति का ही मार्ग चुनो।
हाथों में हथियार नहीं, विश्वास सजाओ,
और मानवता के भविष्य को सुरक्षित बुनो।
धरती का विलाप
धरती रोती है जब उस पर,
खून की धार बहती है।
मानवता की हर चीख यहां,
आकाश तक कहती है।
फूलों की जगह गोलियां,
क्यों खेतों में बोते हो।
अपनी ही इस धरती मां को,
क्यों घाव नए देते हो।
जब प्रेम के बीज बोएंगे,
तब खुशियां लौट आएंगी।
नफरत की सारी दीवारें,
एक दिन ढह जाएंगी।
धरती की यही पुकार है,
अब युद्ध का अंत करो।
प्रेम और करुणा से मिलकर,
जीवन का संतुलन भरो।
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)




