
साक्षी है बलिदान की, धरती प्रयागराज।
जहाँ गूँजी थी गोलियाँ, अमर हुए आज़ाद।।
भाभरा की पावन धरा, जनमा सिंह-स्वरूप।
माँ जगरानी की गोद में, पलता क्रांति-अनूप।।
कोड़े खाकर हँस पड़े, बोला दृढ़ आवाज़ —
“नाम मेरा आज़ाद है, रहूँ सदा आज़ाद।”।।
काकोरी की रण-योजना, बिस्मिल संग प्रचंड।
हिला दिया साम्राज्य को, टूटा शासन-दंड।।
भगत, सुखदेव, राजगुरु, संग लिए हुंकार।
युवा रक्त में ज्वार था, जलता अंगार।।
सांडर्स-वध की गर्जना, काँपा फिरंगिस्तान।
असेम्बली में गूँज उठा, क्रांति-मंत्र महान।।
अल्फ्रेड पार्क बना रणक्षेत्र, छिड़ा प्रलय-संघर्ष।
तीन गिरे अत्याचारी, देख शौर्य उत्कर्ष।।
प्रतिज्ञा थी जीते-जी, न होगा अपमान।
अंतिम गोली स्वयं पर, रख ली अपनी शान।।
हम आज़ाद थे, हैं भी, होंगे सदा आज़ाद।
भारत माँ के मस्तक का, अटल अमर विश्वास।।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*




