
नहीं त्रैलोक्य भर में है,प्रथम जो पूज्य कहलाता।
अपरिमित ज्ञान के स्वामी, जगत को नाम है भाता।।
अमर तन पद प्रतिष्ठा है, बने शुभ छंद के ज्ञाता।
बनी पहचान लम्बोदर ,पिता शिव जी उमा माता।।
चढ़ाऊँ कैथ जम्बू है,लगाऊँ भोग मोदक का।
कहाते वक्र तुंडक हो,मिला है नाम बोधक का।।
बहुत प्रिय है तुम्हें दूर्वा, सुपारी पान भी चढ़ता।
कृपा जिस पर किए प्रभुवर, वही रचना सदा पढ़ता।।
चरण में ठौर दे देना,झुकाकर सिर खड़ी द्वारे।
हरो सब कष्ट शिवनंदन, पुकारें भक्त मिल सारे।।
सदा भंडार भरते हो,दया करना तुम्हें आता।
करे आराधना जो भी,मधुर फल वो सदा पाता।।
गजानन ने किया जैसा,करें हम अनुशरण उनका।
प्रथम माता-पिता मानें ,छुए थे नित चरण उनका।।
सभी तीरथ वहीं मानें ,जहांँ माता-पिता रहते।
उन्हें जग में इसी से ही, प्रथम हैं पूज्य सब कहते।।
डॉ गीता पाण्डेय “अपराजिता”
उपप्रधानाचार्य हिंदी (प्रवक्ता)
कान्ह शिक्षा नि इं कॉ करहिया बाजार
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश




