साहित्य

गौरेया

पंडित मुल्क राज "आकाश"

आंगन की रौनक नन्ही सी जान,
प्यारी गोरिया मेरी शान।

फुदक फुदक कर वह आती है,
मीठे गीत सुनाती है।

तिनका तिनका जोड़ बनाया,
छज्जे पर घरौंदा सजाया।

चीची कर सबको जगाती,
आलस सारा दूर भगाती।

कंकड़ चुनती दाना खाती,
पंख फैलाकर वह उड़ जाती।

धूप सुनहरी उसे सुहाये,
धूल में अपनी प्यास बुझाये।

मिट्टी में वह खूब नहाती,
पंख झटक कर है इतराती।

बिल्ली से है सदा डरती,
छुप-छुप कर है बातें करती।

मेरे आंगन का वह तारा,
सबको लगता रूप ने प्यारा।

छोटा सा उसका शरीर,
पर उड़ती जैसे कोई तीर।

प्रकृति का अनमोल उपहार,
देती सबको ढेर सारा प्यार।

इसे बचाना फर्ज हमारा,
यह पक्षी है सबसे न्यारा।

सुनकर इसकी चहचाहट,
घर में होती बड़ी बूगाहट।

आओ हम सब मिलकर ठाने,
इस जीव की कीमत पहचाने।

पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश

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