
गुज़रे बहुतों साल मग़र ख़ुशहाल रहो तुम,
हम कैसे न पूछो मेरे हाल मग़र ख़ुशहाल रहो तुम।
भूल गए उन लम्हों को या याद अभी भी करते हो,
होली में रंगे थे दोनों गाल मग़र ख़ुशहाल रहो तुम।
बीत गए बचपन के वो दिन संग में खेला करते थे,
चलते थे दोनों मस्तानी चाल मग़र ख़ुशहाल रहो तुम।
अक्सर वादे टूटा करते लो इक वादा फ़िर करते हैं,
मिलेंगे अगले साल मग़र ख़ुशहाल रहो तुम।
इश्क़ के मोती पिरो-पिरो कर तुम्हें बनाया
“रहमत” ने बा कमाल मग़र ख़ुशहाल रहो तुम।
~शेख रहमत अली “बस्तवी”
बस्ती (उ. प्र.)




