
कोख पले संतान हमारी, पता चला जब उसको ।
पूर्ण हुआ है नारी जीवन, धन्य समझती खुद को ।।
इक -इक पग वो धीरे धरती, ममता हृदय पनपती ।
आँगन में इक फूल खिलेगा, हर पल खुशी बरसती ।।
खुद में ही वो बातें करती, चाँद कहूँ मैं तुझको ।
पूर्ण हुआ है नारी जीवन, धन्य समझती खुद को ।।
खट्टा मीठा जो भी भाता, नाप तौल कर खाती ।
बच्चा मेरा स्वस्थ रहेगा, यही भाव मन लाती ।।
लाल हमारा जग से न्यारा, छिपा रखूँ मैं उसको ।
पूर्ण हुआ है नारी जीवन, धन्य समझती खुद को ।।
माँ बनती है जब इक नारी, तब ही होती पूरी ।
उसके जीवन के खुशियों की, संतति ही है धूरी ।।
ध्यान रखूँगी निज बालक का, छोड़ूँ काम जरूरी ।
पूर्ण हुआ है नारी जीवन, धन्य समझती खुद को ।।
नीलम अग्रवाल रत्न बैंगलोर
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