साहित्य

है जग जननी अंबे माता

डॉ ऋतु अग्रवाल

हे! जगजननी अंबे माता, शत-शत है प्रणाम।
छलक रहा है स्नेह चक्षु से, छवि बहुत अभिराम।।

लाल चुनरिया सिंह सवारी, हरती भक्त पीर।
नंगे पाँवों दर पर आती, दर्शन हेतु भीर।।
श्रद्धा मन रख माँगो माँ से, करती पूर्ण काम।
छलक रहा है स्नेह चक्षु से, छवि बहुत अभिराम।।

रक्षा करती हर संकट में, बनती दुष्ट काल।
शरण गया जो मातु भवानी, काटती जंजाल।।
त्रिकुटा पर्वत जा बैठी है, पावन चारु धाम।
छलक रहा है स्नेह चक्षु से, छवि बहुत अभिराम।।

तिमिर घनेरे में भी मैया, भरती है उजास।
यही प्रार्थना करती हूँ माँ, हर घर कर निवास।
कृपा अगर हो माँ अंबे की, रहें कर्म सकाम।
छलक रहा है स्नेह चक्षु से, छवि बहुत अभिराम।।

स्वरचित
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश

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