
काश मैं खुद को ढूँढ पाती
सब में खुद को पाती
सारी अच्छाइयों का ढेर
काश मेरा गलीचा होता।
काश लड़कियाँ सुरक्षित रहतीं
दुनिया में सर ऊँचा होता
काश हर व्यक्ति साक्षर होता
गरिमामयी जीवन जीता।
काश बंद होते मजहबी दंगे
हर आँगन ठहाके मारता
सरहद पर सैनिक सारे
महफूज रहते भाई बेचारे।
काश पेड़ पर उगती खुशियाँ
तोड़ते सब मनमर्जियाँ।
काश देखते जो सब सपने
दामन में जगमग करता।
काश मोड़ सकती मैं वह पन्ना
जिसमें दुख अंकित होता।
डॉ.पुष्पा सिंह




