
मैं वीणा के इन तारों में,
भोले की धुन भर दूंगा,
महक उठेगा आंगन सारा,
मन भर चंदन धर दूंगा।
मैं वीणा के ….
साज छेड़ेगा जब भी कोई,
भोले का स्वर गूंजेगा,
मन का एक-एक तार हमारा,
भोले के रंग में डूबेगा।
मैं वीणा के ….
भोले ही हर धुन के ज्ञाता,
धुन बजती हर भोले से,
भोले से हर गीत संवरता,
धाम चलें हम भोले के।
मैं वीणा के ….
जब-जब तार भोले से जुड़ता,
मन झंकृत हो जाता है,
धड़कन भी तब सुर में गाती,
मन बाग-बाग हो जाता है।
मैं वीणा के …
अगन लगी है भोले से,
कुछ और नहीं हमको भाता,
सांझ-सवेरी जब भी देखो,
मन भोले-भोले ही गाता।
मैं वीणा के ……
(256/314 वां मनका)
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कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
गांधीनगर इन्दौर (म.प्र.)




