
विवेकशीलता, सकारात्मकता
जिस जिसके विचार में होती है,
प्राकृतिक सुविधाओं की सुखद
प्रसन्नता सदा उन्हें प्राप्त होती है।
उसके लिए प्रकृति और परमात्मा
के वह कृतज्ञ, एवं धन्यवाद देते हैं,
जीवन में जो उन्हें नहीं मिल पाता है,
उस अभाव का रोना कभी नहीं रोते हैं।
कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो प्राप्त
सुविधाओं का सुख नहीं ले पाते हैं,
पर अप्राप्त का ही रोना रोते रहते हैं,
उसको पाने में समय व्यर्थ करते हैं।
जब वह वस्तु प्राप्त हो जाती है,
तो उसका आनंद नहीं ले पाते हैं,
फिर नई दौड़ में शामिल हो जाते हैं,
और यह क्रम निरंतर चलाते रहते हैं।
ऐसे व्यक्ति अपना जीवन प्रायः
रोते रोते ही व्यतीत करते रहते हैं,
न खुद सुकून से रहते हैं और नही,
दूसरों को सुकून से रहने देते हैं।
शान्त सुखद जीवन जीने के लिए हमें
विचारों को सकारात्मक रखना होगा,
मुसीबतों का डटकर मुक़ाबला कर
अपने उपर हावी नहीं होने देना होगा।
जब दूसरों से अपनी तुलना करेंगे,
हमसे ज़्यादा दुखी दूसरों को पाएँगे,
यह सब तब सम्भव है जब हम जीवन
के प्रति सकारात्मक रुख़ अपनाएँगे।
नकारात्मकता का कोई स्थान नहीं है,
सुख दुख दोनों जीवन का हिस्सा हैं,
सुख दुख थोड़े समय के लिए आते हैं,
तब परिस्थिति से जूझ निकल आते हैं।
आदित्य दुनिया में शायद ही कोई हो,
जो सब प्रकार से सम्पूर्ण सुखी हो,
जिसने कभी असफलता न पाई हो,
जीवन में कभी कुछ दुखद न देखा हो।
डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ




