
थक चुके अब पाँव चलते-चलते,
मोड़ पर खड़े हुए हैँ तेरे,
धूप यादों की पिघल रही है,
साये होने लगे हैं अब गहरे,
पूछती हैं मुझसे यह ख़ामोश राहें,
किस तरफ मुड़ेगी अब ये ज़िंदगी
हाथ में बस ख़्वाब की बारात
आँखों में धुंधला समाँ-समाँ,
वक़्त की इस रफ्तार में हम
कब से रुके हुए हैं,
अपनी ही दहलीज पे हम !!
वही धूप है, वही छाँव है,
वही मिट्टी का बना गाँव है।
थक चुके थे जो पैर चलते-चलते,
आज फिर दौड़ पड़े हैँ देख नन्हे पाँव!
पोते -पोती की हँसी में अपनी जवानी ढूँढ लेते हैं,
दादा दादी उनकी आँखों मेंअपनी
पुरानी कहानी ढूँढ लेते हैं।
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✍🏼पंकज पाण्डेय, शिकोहाबाद,




