
जीवन-चक्र अनवरत चलता,
थमता नहीं प्रवाह,
आना-जाना लगा ही रहता,
यही सृष्टि की राह।
मिट्टी से बने हैं आखिर हम,
मिट्टी में मिल जाना है
नश्वर है यह देह हमारी,
अमर आत्मा को माना है ।
सूरज उगता, ढल जाता है,
चाँद घटे-बढ़ जाए,
तारे अपने पथ पर चलकर,
अपना उजियारा फैलाएँ।
धरती घूमे अपने धुरी पर,
आकाश गंगा में चक्र लगाता है
हर कण में है गति छिपी हुई,
हर पल कुछ सिखलाता है।
जन्म और मृत्यु जीवन के,
दो किनारे कहलाते हैं।
बीच बहती धारा में हम,
अपनी कर्मों की नाव चलाते।
जैसा बोओगे बीज यहाँ पर,
वैसा ही फल तुम पाओगे,
सत्कर्मों की खेती कर लो,
तो जीवन में उजियारा लाओगे।
सत्य-पथ पर जो चलता है,
हर डर को दूर भगा देता।
न्याय, दया और सेवा से ही,
मानवता का धर्म निभा देता।
त्याग-भाव से किए कर्म जब,
जग में करुणा के दीप जलाते,
जीवन के अंधियारे पथ को,
स्वयं प्रकाशित कर जाते।
सुख-दुख आते-जाते रहते,
नभ में बादल जैसे छाएँ,
धीरज रख जो आगे बढ़ता,
मंज़िल उसके पास आ जाए।
परिवर्तन ही शाश्वत नियम है,
समय सदा चलता रहता।
हर क्षण नया संदेश दे कर,
जीवन पथ बदलता रहता।
सब प्राणी एक सूत्र में बँधे,
प्रेम की डोरी थामें सब।
तू-मैं का जो भेद मिटे तो,
जग में शांति पायें सब।
करुणा, मैत्री भाव जगाकर,
मानव धर्म निभाएँ हम।
वसुधैव कुटुंबकम् को माने,
जग को अपना बनाएँ हम।
स्वरचित मौलिक रचना
सुमन बिष्ट, नोएडा




