
दिन भर थक के ,
क्यों हार गया में।
थोड़े श्रम से ,
क्यों थक गया में।
सोचता हूं,
क्यों बदल गया इंसान इतना ?
पहले श्रम, कर्म से थकता नहीं था ।
अब जाने क्यों हार गया है?
धीरे धीरे सब ढला बिगाड़ लिया है।
जाने क्यों , इंसान ने अपना जीवन बिगाड़ लिया हैं।
खुदको समय देने की जगह, दिया समय मोबाइल को ।
ना जाने क्यों , इंसान इतना बदल गया है?
– रिया राणावत
कालीदेवी, झाबुआ (मध्य प्रदेश)



