साहित्य

लघुकथा “दिखावा”

नरेश चन्द्र उनियाल

एक शाम वैष्णवी को खबर मिली कि मधुलिका अस्पताल में भर्ती है। वह तुरन्त अस्पताल पहुँची…. मधुलिका अकेली एक कमरे में लेटी थी, उसकी सूजी हुई आँखें शून्य को निहार रही थीं। वैष्णवी को सहसा सामने पाकर वह बहुत खुश हुई….वह वैष्णवी से लिपट पड़ी, उसकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी…..उसे अपना अतीत याद आ रहा था…
वैष्णवी और मधुलिका बचपन की सहेलियाँ थी। वैष्णवी एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवार से थी जबकि मधुलिका एक संपन्न परिवार की लड़की थी। वैष्णवी पढ़-लिखकर एक छोटी सी जॉब पाकर अपने परिवार के भरण पोषण मे लीन हो गई, वहीं मधुलिका नें बिना शादी किये धनाढ्य जीवन शैली अपना ली थी…ब्रांडेड कपड़े, मँहगी गाड़ियाँ और हर वीकेंड पर पार्टियाँ….उसका शगल हो गया था।
जब कभी दोनों सखियाँ मिलतीं, मधुलिका हमेशा अपनी शान बघारने से चूकती नहीं थी… हर मंहगी खरीदारी या विदेश यात्रा का बखान करते थकती नहीं थी वह….वैष्णवी यह सब चुपचाप सुनती… बीच मे कभी हौले से मुस्कुरा देती थी। बातों-बातों में एक दिन मधुलिका नें वैष्णवी से कहा, “वैष्णवी! थोड़ा तुम भी सोशल हो जाओ न? …देखो मैं कितनी व्यस्त रहती हूँ… कभी इस पार्टी में….कभी उस क्लब में… और…!!
बीच मे ही वैष्णवी बोल उठी…. देखो मधुलिका…मैं अपनी छोटी सी दुनिया में ही खुश हूँ… यहीं संतुष्ट हूँ।”

सामने हकीकत देखकर मधुलिका बोली, “यह सब दिखावा था वैष्णवी…ये मँहगी चीजें…ये पार्टियाँ… सब बस दिखावा मात्र था, अन्दर से तो मैं अकेली और खोखली ही थी। आज जब सामने मुश्किल घड़ी आई.. तो कोई भी दोस्त साथ नहीं है। मैं बिल्कुल तन्हा और अकेली हूँ। तू सही कहती थी वैष्णवी… कि अपनी छोटी सी दुनिया मे सुख से रहना ही असली जीवन है। आज मैं समझ गई हूँ कि सच्चा सुख और सच्चे रिश्ते, दिखावे की दुनिया से कहीं ज़्यादा कीमती होते हैं।

✍️*नरेश चन्द्र उनियाल’*
“कमली कुंज”
*देहरादून, उत्तराखण्ड*।

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