
मंद-मंद मुस्कान लिए सुबह सुबह जब आते हो।
अंधियारी हर कर के उजाला फैलाते हो।।
कोना कोना रोशनी से भर जग को जगाते हो।
मधुर किरण बन धरती पर उतर आते हो।।
प्रथम प्रभात की किरण से प्रकृति का रूप निखारा।
जगमगा रही दुनिया सूरज ने किया उजाला।।
नयनों में संकोची चमक, चाँदनी का विस्तार।
स्पर्श बिना ही दे जाती स्नेहिल सा उपहार।।
तुमसे ही तो जीवन में, हर दिन नई तरुणाई है।
सादगी भरी उस हँसी में, स्नेह का सुंदर हार है।।
रूठे मौसम मान जाएँ, ऐसी तुम्हारी छवि।
सूखे पत्तों में भी भर दे कोमल हरियाली नव।।
हँसी तुम्हारी जैसे कोई मंदिर की मीठी घंटी।
तुमसे ही पुरानी यादें भूल उल्लास से भरी।।
मंद-मंद मुस्कान तुम्हारी जीवन का उत्सव है।
हर पीड़ा के पार खड़ा विश्वास का नव स्वर है।।
बस यूँ ही मुस्काते रहो तुम निर्मल भाव लिए।
इस मुस्कान में ही तो जग का सारा स्नेह जिए।।
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ममता झा मेधा
डालटेनगंज



