साहित्य

मेरी जीवनसंगिनी — सरिता

अतुल पाठक

मेरे जीवन की मधुर कहानी हो तुम,
थके मन की शांत रवानी हो तुम।
सूझ-बूझ से हर पल सँवार देती हो,
मेरे घर की सच्ची निशानी हो तुम।
कभी रूठती हो, कभी मुस्काती हो,
पर दिल से बहुत ही प्यारी हो तुम।
भावों से निर्मल, मन से कोमल,
स्नेह की उजली क्यारी हो तुम।
सुख-दुःख के हर पल में साथ निभाया,
कभी छाया बनकर, कभी दीप जलाया।
जब जीवन का मार्ग कठिन हो जाता,
तुमने ही हौसला बनकर रास्ता दिखाया।
मकान को तुमने घर बनाया,
हर रिश्ते को प्रेम से सजाया।
अपनेपन की डोर में बाँधकर सबको,
परिवार का आँगन सदा महकाया।
तुमसे मेरा जुड़ाव
सिर्फ पति-पत्नी का बंधन भर नहीं,
ये आत्मा से आत्मा का नाता है।
जहाँ शब्द आकर ठहर जाते हैं,
वहीं से प्रेम अपना अर्थ बताता है।
बस ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ,
तुम सदा स्वस्थ और खुशहाल रहो।
तुम्हारी मुस्कान से ही मेरा संसार है,
यूँ ही जीवन भर मेरे साथ रहो।

मौलिक/स्वरचित
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)

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