साहित्य

तेरे बिना ये दिल है बावला

उदय किशोर साह

ढुँढ् रही है मेरी सूनी आँखें तुमको जानम
फीकी लग रही है ये वरसती पावन सावन
वन उपवन ये पर्वत बैठा है आज    उदास
किस वैरी के आँगन में कर रही हो तुँ वास

तेरे बिन ये  रात रो रही करती है    विलाप
किस पाप की ये रूत पा रही है  ये    श्राप
अँधेरी रात जाग कर देख रही है तेरी आस
मेरा दिल कह रहा है तुँ हो कहीं आस पास

दुःखी दिल की सुन लो  दिल की आज पुकार
कर दो जानम मेरे मन की बगिया को गुलजार
पत्ते पत्ते से पूछ लो  मेरे मन में कितना है प्यार
मत कर मेरे प्यार से तुम कोई भी अब तकरार

आस की दीप जलाये बैठा हूँ घर के चौखट पे
वापस आ जा तूँ सब गिले शिकवे भुला     के
तेरे बिना ये घर आँगन भी है कितनी सूनी सूनी
लगता है इस मौसम को लग गया है रोग  पूनी

मत लो तुम हमसे प्यार में कोई भी      बदला
मैं तेरे प्यार में बन गया हूँ प्रेमी एक      पगला
तेरे बिन ये घर का आँगन भी है बड़ा    बावला
तेरे बगैर दिन की रोशनी  है दिखता है सांवला

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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