
मेरे साथ-साथ जो चलती है, वो मेरी परछाई है,
मुझसे भी लंबी दिखती, जैसे कोई गहरी खाई है।
अंधेरे में अपनी ही सूरत देख, मैं झटके से डर जाती हूँ,
बहन का कसकर हाथ पकड़, छत की सीढ़ियों से भाग आती हूँ।
डर के मारे लबों पर बस, ‘हनुमान-हनुमान’ आता है,
अपना ही साया देख कर, मेरा मन घबराता है।
पापा हर रोज़ प्यार से, बस यही बात समझाते हैं,
“परछाई है ये बिटिया,” कह कर गले लगाते हैं।
चाहे सजीव हो या निर्जीव, साया सबका होता है,
रोशनी के खेल में, ये अक्स कभी न सोता है।
पापा टॉर्च जलाकर, लंबी परछाई बना दिखाते हैं,
पर मन का वो अनजाना भय, वो पल भर में कहाँ जाते हैं?
मैने पूछा, “पापा! ये दिन में क्यों छिप जाती है?
सिर्फ रात के सन्नाटे में, क्यों मुझको डराती है?”
पापा हंसकर बोले, “ये तो तेरी जुड़वा बहन जैसी है,
दिन के उजाले में शरमाती, रात में दिखती ऐसी है।”
“देखो! इसे ‘बाय’ करो, तो ये भी हाथ हिलाती है,
तुम जैसे-जैसे चलती हो, ये कदम साथ बढ़ाती है।”
अब मेरी परछाई, मेरे संग-संग ही सोती है,
मेरे जागने पर चुपके से, ये भी पास ही होती है।
कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)




