
आज भी आधी दुनिया
अपने हिस्से का आसमान
मांगती नहीं
बस उसे जीने का अधिकार चाहती है।
वह रसोई की आँच में
सपनों की रोटी सेंकती है,
और दफ्तर की फाइलों में
अपने पंख तलाशती है।
कभी बेटी बनकर
घर का उजाला होती है,
कभी माँ बनकर
थके समय को सहलाती है।
पर सवाल अब भी खड़ा है
क्यों हर कदम पर
उसकी राह तौली जाती है?
क्यों उसकी उड़ान
परंपराओं की डोरी से बाँधी जाती है?
समय कहता है
अब बदलो सोच की दीवारें,
नारी को मत दो
केवल उत्सवों के उपहार।
उसके श्रम, उसके स्वप्न
और उसकी पहचान को
सिर्फ़ एक दिन नहीं,
हर दिन का सम्मान दो।
क्योंकि जब नारी मुस्कुराएगी
तो समाज खिलेगा,
और जब नारी आगे बढ़ेगी
तो भविष्य भी चमकेगा।




