साहित्य

मिट्टी का घड़ा

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

कुम्हार उठा सुबह सवेरा,
ले आया मिट्टी का ढेर घनेरा।
प्यार से उसे गूंथा, थामा,
सपनों का एक रूप रच डाला।

चाक घुमाया, दिल लगाया,
घड़े को सुंदर आकार दिलाया।
हर उभार, हर मोड़ में भावना थी,
उस मिट्टी में जैसे जान समा दी।

सूखाया, तपाया, फिर रंग चढ़ाया,
अपनी मेहनत से जीवन सजाया।
बन गया जब प्यारा घड़ा,
लेकर चला वो बाज़ार की ओर बड़ा।

लोग आए, देखा, मुस्काए,
पर कीमत पूछते ही पीछे हट जाएं।
“क्या इतना ही है इसका मोल?”
सुन कुम्हार का टूट गया दिल और हौसला डोल।

सोचा—
“जिसे रचा है मैंने जान से,
जो देगा ठंडा जल तपते इंसान को प्यास से,
जो गर्मी में शीतलता का संदेशा लाएगा,
हर प्यासे के होंठों पर राहत बन छाएगा।”

“उसे तुम तौलते हो सिक्कों के तराजू में?
क्या मेहनत की कोई कीमत नहीं आज के दौर में?”

आंखों में आंसू, पर दिल में सुकून,
क्योंकि जानता था वो एक सच्चा जुनून।
“मेरा घड़ा है अमूल्य,” उसने मन में ठाना,
“जिसने एक बार इसका पानी पिया,
उसने मेरा प्रेम पहचाना।”

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
जगदलपुर राजिम
छत्तीसगढ़

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