साहित्य

मन मेरा डोले भोले

कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी 'राम'

कहां-कहां मन मेरा डोले,
पवन गति से इत-उत दौड़े,
समय की घड़ियां रुक नहीं सकतीं,
सार समझ ले रे मन भोले।
कहां-कहां मन …..
आना-जाना चलता रहता,
कौन यहां रुक पाया है,
घड़ी किसी के पास खड़ी है,
फिर भी मन को भरमाया है।
कहां-कहां मन …
तन है एक पत्ते-सी कुटिया,
गंग से भर ले छोटी लुटिया,
यहीं कहीं तेरा भाग बंधा है,
खुशबू से भर दे तू बगिया।
कहां-कहां मन ….
समय की दूरी है मजबूरी,
फिर भोले से कैसी दूरी,
नयन बिछा दे चरण में उनके,
होगी कामना तेरी पूरी।
कहां-कहां मन ….
(257/315 वां मनका)
“””””””””””””””””
कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
गांधीनगर इन्दौर (म.प्र.)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!