
बड़ी तीक्ष्ण होती है भैया, मुख की शब्द कटारी।
खींच लगाम सदा रखिएगा, इसकी रुचि अय्यारी।।
नातों में यह सेंध लगाती, देती पीड़ा गहरी।
जिह्वा के भावों से होती, श्रवण शक्ति मन बहरी।।
प्रेम वाहिनी कर लेती है, अपनी उर्ध्व किनारी।
खींच लगाम सदा रखिएगा, इसकी रुचि अय्यारी।।
हथियारों से भी घातक यह, करती वार करारा।
एक घड़ी में हो जाता है, अवसित भाईचारा।।
लाख सुलह की दवा कराएँ, रहती लज्जत खारी।
खींच लगाम सदा रखिएगा, इसकी रुचि अय्यारी।।
लाख क्षमा माँगे कोई फिर, क्षतिपूर्ति नहीं होती।
मृत रिश्तों के तन जीवन भर, वेदित अर्थी ढोती।।
दबी राख के नीचे जीवित, रहती है चिंगारी।
खींच लगाम सदा रखिएगा, इसकी रुचि अय्यारी।।
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश




