
मुस्कुराती हूँ मैं , गुनगुनाती हूँ मैं,
हँसके कलियाँ से मैंने कहा प्यार से,
तुम खिलो संग-संग मुस्कुराती हूं मैं ,
बिखरी खुशबुओं में डूब जाती हूं मैं ।
जिंदगानी में मौसम की भरमार है,
सुख-दुख दो पहलू काअख्तियार है,
धूप के बाद छाँह, रात के बाद दिन ,
हरेक मौसम का आना तय यार है,
हर पहलू से नज़रें मिलाकर उसे,
अभिनंदन कर माला पहनाती हूँ मैं ।
किसको मालूम क्या हो अगले पल ?
जिंदगानी कब जाएगी करवट बदल ?
बीते जाते हैं पल कितने अनमोल से ?
जीत लो इन पलों को मधुर बोल से,
मधुर बोलो से मन की तहें खोल के,
हुनर जीने का सबको सिखाती हूं मैं ।
ग्रीष्म ,वर्षा, शीत ऋतु आती रहीं,
जिंदगी उनमें उत्सव मनाती रहीं,
लिख भाग्य विधाता ने भेजा यहाँ,
उसकी कृपा से मैं जगमगाती रही,
मन के मंदिर में पूजा की शक्ति भरी,
शीश श्रद्धा से प्रभु को झुकाती हूँ मैं ।
सरोज शर्मा
दिल्ली




