
ना जाने क्यों कहते हैं लोग
स्त्री एक कोरा कागज़ होती है
नहीं! ग़लत कहते हैं लोग
ना कोरा होती है और ना कागज़ होती है स्त्री
अपितु ख़ुद में एक संपूर्ण किताब होती है स्त्री
इस किताब में बस एक पन्ना कोरा
उसके जन्म का होता है
बाकी तो हर पन्ने पर लिखी होती है
कोई ना कोई इबारत
किसी के अधिकारों की
या उसके कर्तव्यों की
और हैं कुछ बंदिशें मर्यादा की
बांधे हैं समाज ने उसके लिए
कुछ दायरे भी
और इन्हीं दायरों में बंधी
ज़िंदगी के आख़िरी पन्ने
अपने मरण तक
पढ़ती नहीं इस किताब को
जीती है स्त्री।।
डॉ. अनीता शाही सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर
प्रयागराज




