साहित्य

नज़्म

मुल्क राज "आकाश"

मुंतज़िर आंखें और यह शब- ए- तन्हाई,
धड़कनों में गूंजती है तेरी रुसवाई।

दस्त ए हिज़्र में भटकता है ज़हन मेरा,
मस्कन बना है अब ये गम का घेरा।

नक्श ए पा के जुस्तजू में कट रही उम्र,
आजमाइश ए इश्क में टूटा है मेरा सब्र।

फसलों की ग़र्द में धुंधली है हर राह,
लबों पे दबी है एक ठंडी सी आह।

वस्ल की उम्मीद में गुजरेंगे ये माहों – साल,
आकाश अब तेरे बगैर जीना है मुहाल।

मुल्क राज “आकाश”

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