
मिले जब से ऱफ़ीक़-ए-ज़ा बदल दी कायनात मेरी,
हर इक लम्हा मशर्रत है, हर एक साअत सौगात मेरी।
तपिश जो राह में ठहरी, बनी है अब दुआ तेरी,
पज़ीराई जो तूने की, तो बदली है सिफात मेरी।
मेरे वीरान गुलशन मेंअब, खिली यादों की कली अब,
रूह को मिल गया मस्कन, हुई है बात-बात मेरी।
तू ही महताब- ए-शब मेरा मैं तेरा अक्स हूं हमदम,
तेरी ही जुस्तजू मैं अब कटी है रात-रात मेरी।
नसीब ए आशिकी देखो, तू आया है मुकद्दर में मेरे,
बिछड़ कर खुद से मिली है हमें ज़ात मेरी।
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पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश




