
यही माता सती भी है । भगवान शिव से विवाह के उपरांत जब प्रजापति दक्ष ने महायज्ञ का आयोजन किया था तो उसने सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया परन्तु भगवान शिव और अपनी पुत्री माता सती को नहीं बुलाया ।जिसके परिणामस्वरूप सती ने क्रोध में आकर उसी यज्ञ में अपनी आहुति दे दी। अगले जन्म में माता ने हिमालय के यहां जन्म लिया।इसी कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा । पार्वती और हेमवती भी इन्हें ही कहा जाता है ।
इनकी सवारी वृषभ है । इसलिए इन्हें वृषारूढ़ा भी कहते हैं ।माता के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कलम धारण करती है । बहुत ही स्वच्छ तन मन कर तब उपवास करना चाहिए। सूर्य उदय के साथ माता की पूजा अर्चना करनी चाहिए ।शाम के समय पूजा अर्चना करते हैं । सबसे पहले नवरात्रि में माता शैलपुत्री को गाय के घी का भोग लगाया जाता है। माता सभी को सुख-समृद्धि देती है ।पूरे दिन उपवास करने के पश्चात फलाहार करना चाहिए किन्तु जो व्यक्ति किसी कारण वश पूरे दिन का उपवास करने में असमर्थ हो वे एक समय (शाम के समय )खाना खा सकते हैं ।
मंत्र______
वन्दे वंच्छितला भाय चन्द्रा घकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनम्।।
प्रिया काम्बोज ✍️ सहारनपुर उत्तर प्रदेश




