साहित्य

खिड़की पर ठहरी धूप

अनिता मंदिलवार 'सपना'

खिड़की पर ठहरी धूप ने,
धीमे से दस्तक दी आज,
नींद भरी आँखों में भर दी,
सुनहरी सी एक नई आवाज़।

किरणों की उँगली थामे जैसे,
सपनों को जगाती जाए,
मन के कोने-कोने में फिर,
उम्मीदों के फूल खिलाए।

चुपके से आकर कहती है—
मत रुकना अब यूँ ही तुम,
हर दिन एक नया अवसर है,
आगे बढ़ो, न डरना तुम।

धूप की ये मीठी चादर,
दुख की ठंडक हर लेती,
जीवन के हर सूने पल में,
हौसलों की गर्मी भर देती।

खिड़की पर ठहरी ये धूप,
बस इतना सा संदेश सुनाए
जो जागे दिल की रोशनी से,
उसका हर दिन खिल जाए।

अनिता मंदिलवार ‘सपना’

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