
रखते थे जो मेरा ख़्याल कभी,
छाँव बने हर पल जीवन में।
जमाने की तीखी नज़रों से,
बचाते थे ममता के आँगन में।
पिता की छाया, माँ की ममता,
भाई का स्नेह सहारा था।
हमसफ़र का भी हाथ थामकर,
जीवन का हर पल प्यारा था।
धीरे-धीरे सब रुख़सत होकर,
स्मृतियों में बसते जाते हैं।
तन्हा राहों की धूप भरी में,
बस यादों के दीप जलाते हैं।
अब जीवन की इस निर्जनता में,
मन अपनी व्यथा सुनाता है।
पराधीनता की डोर बँधी है।
स्वयं का भी ख़्याल न आता है।
कैसे कहूँ यह बेबसी अपनी।
मन भीतर ही रो जाता है।
सब रहमत पर छोड़ दिया अब।
विश्वास प्रभु में सो जाता है।
जब कोई न साथ निभाता है।
प्रभु ही सहारा बन जाते हैं।
शरण तुम्हारी अंतिम आशा।
बस यही ख़्याल रह जाते हैं।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




