साहित्य

वर्ष नव, हर्ष नव

विरेन्द्र जैन माहिर

वक्त गुजरा और समय का नया कलेवर छा गया,
रंग बदला और सुवाद का नया फ्लेवर भा गया,
दिन रात की शतरंज में इक नई बिसात बिछ गई,
दीवार पर उसी पुरानी बस नया कैलेंडर आ गया!

सुख और दुख के पाट में गेहूं के संग घुन भी पिसा,
अच्छा बुरा और राग द्वेष का मोह मन से कब मिटा,
वर्ष क्या अनंत जन्मों को नया माना किए,
चलते रहे पर राह वही उसी पुरानी रही दिशा!

अनमोल है जीवन इसे ना व्यर्थ में यूं ही गंवाना,
एक एक पल को आखिरी फिर मानकर उसको बिताना,
स्क्रोल करके अब तलक तुमने क्या पाया सोचो ज़रा,
प्रमाद छोड़ स्व पर कल्याण का इक नया दीपक जलाना!

अब जो हो एक परिवर्तन तो नया यह वर्ष रहे,
तोड़ कर जंज़ीर मिथ्या मान्यताओं की मन कहे,
संकल्प विकल्प के पिंजरे में अब क़ैद ना करो इसे,
नज़रिया बदलो जीने का, नव प्राण ऊर्जा तव बहे!

विरेन्द्र जैन माहिर
वड़ोदरा गुजरात

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