ऋतुराज बसंत आ गए

रंग वासंती … धरा पर छा गए,
देखो-देखो ऋतुराज बसंत आ गए।
1- शीत प्रपात से मुरझाई लता को,
जीवन ज्योति मिली कुंज कुंज को,
नवरस नव किसलय में घुलने को,
आतुरता से पल-पल हैं खिल गए।
रंग वासंती…. धरा पर छा गए,
देखो-देखो ऋतुराज बसंत आ गए।
2- नीलाभ आसमांँ है,हरिताभ वसुधा है,
पीताम्बर ओढ़े शस्य श्यामला धरा है,
कनक बालियों की कैसी स्वर्णाभ छटा है,
मुकुलित मंजरियों से उपवन सज गए ।
रंग वासंती…. धरा पर छा गए,
देखो-देखो ऋतुराज बसंत आ गए।
3- गमक उठा फागुन, बयार बह रही है,
फूट रही कोंपल सुगंध उड़ चली है,
हरष रहा तन मन,भावों की लड़ी है,
प्रिया से मिलन को प्रियतम ठहर गए।
रंग वासंती…. धरा पर छा गए,
देखो-देखो ऋतुराज बसंत आ गए।
4- बर्फीली चादर से गिरिवर ढका है,
सूर्य के अंतः में सुलगती प्रभा है,
रंग रंगीली चूनर की अनुपम छटा है,
सुषमा प्रकृति की पलछिन में बढ़ गए।
रंग वासंती…. धरा पर छा गए,
देखो-देखो ऋतुराज बसंत आ गए।।
गीतकार- सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक कृति, ©®,रुद्रपुर, ऊधम सिंह नगर,उत्तराखंड।




