साहित्य

सृष्टि का सृजन

कवयित्री ज्योती वर्णवाल

सृष्टि के कण-कण बसता ,महादेव का आधार है ,
पूर्ण होती यह दुनिया तब ,जब उनका परिवार है ।
हँसी ख़ुशी का जीवन होता , पर शिव जों अकेले होते ।
दूजी-तीजी जान कहाँ थी ,हम सब अस्तित्व को खोते ?

यदि पार्वती अकेली होती ,यह सृष्टि सूनी होती ,
कहाँ से आते रिश्ते -नाते ,कौन प्रेम का बीज पिरोता ?
ना मौसी- मौसा होते जग में,है ना ममता की कोई कहानी ,
ना होता कोई बेटा राजा,ना होती कोई बिटिया रानी ।

शून्य होती यह धड़ा भी ,न जीवन का कोई नाता होता ,
ब्रह्मा के मुख की वाणी का, भला अर्थ ही क्या होता ?
नर -नारी का पावन मिलन ,श्रेष्ठ निर्णय का स्रोत बना,
पशु -पक्षी और प्रकृति से ही , सृष्टि का हर कोना सजा ।

ना वसंत ऋतु का मौसम आता ,ना रंग मन को भाता ,
संसार कि इस रंगत का फ़िर,कोई ना साखी होता,
ना होतीं यह छह ऋतुएँ प्यारी ,न जीवन का कण -कण होता ।

कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)

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