

सिर नवाकर चरणों में तुम्हारे
कह डालूँ अनकहा मन का प्रभु।
फ़ेरूँ माला तुम्हारे नाम की
करूं गुणगान नाम का प्रभु।
तुम ही आदि अन्त तुम्हीं हो
तुम ही जग पालनहार प्रभु।
नंदी, चंद्रमा, गंगा साथ लिए
तुम सब के सखा सहोदर प्रभु।
तुम से सृष्टि, प्रलय तुम्हीं से
तुम से हर जीव की सांस प्रभु।
तुम नीलकंठ, तुम नटराजन
करो सभी का उद्धार प्रभु।
©संजय मृदुल




