साहित्य

जाते हुए वर्ष को,,,

अवधेश कुमार श्रीवास्तव

मत करें दुखी मन को अपने, कुछ और नहीं बस बदले कलैंडर,
तिथि,दिन,महिना,वर्ष एक से,बस उम्र के जस छपे कलैंडर,
जिस तरह चल रहा जो जैसे, कुछ इधर उधर कर चले हमेशा,
रुके कहां कुछ बदलाव से इसके,बस गणना हेतु है बना कलैंडर।‌।

कहां समाप्त हुआ कुछ भी,किसी वर्ष के आने जाने से,
चलना सतत प्रक्रिया है,चलती रहती,विधि के ताने बाने से
कुछ भी नहीं रुका है भाई, श्रृष्टि सदा चलती जाएगी,
महाप्रलय के समय शायद,यह चलेगी विधान बनाने से।।

बदलाव एक आभूषण है,सजने और सजाने का,
तब तक वह पहनावा था,कुछ अलग भाव सजाने का,
जो कमियां रहीं शेष अब तक,उन्हें सही दुरुस्त का अवसर यह,
हम करें सतत निज सोच को उन्नत हर दिन नव वर्ष मनाने का।‌।

प्रभु का वरदान संग सबके,खूब तराश संवार के बनाया है,
हर युक्ति समाहित की तन में, खुद को खुद का सारथी बनाया है,
गर चलें नीति निर्धारित प्रभु से,हर पल,क्षण सुखमय होगा,
ऐ आर्य पुत्र यह धरा स्वर्ग सी,प्रभु ने इसे बनाया है।।

अवधेश कुमार श्रीवास्तव

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