
शब्द नहीं ये शस्त्र हैं,
जो सत्य की राह दिखाते हैं,
जब झूठ का अंधेरा छाता,
तब कविता दीप जलाते हैं।
ये केवल भावों की धारा नहीं,
ये समय का साक्षी बनती है,
जब इतिहास खामोश पड़े,
कविता ही आवाज़ बनती है।
कभी तुलसी की वाणी बनकर,
मर्यादा का पाठ पढ़ाती है,
कभी कबीर के दोहों में,
सच की चादर बुन जाती है।
कभी मीरा की पीर बनकर,
भक्ति का राग सुनाती है,
कभी दिनकर की ज्वाला बन,
अन्याय से टकराती है।
कविता वो है जो टूटे मन को,
फिर जीने की आस दिलाए,
कविता वो है जो सोए जन को,
अपने हक़ का ज्ञान दिलाए।
आज उसी का अभिनंदन है,
जो हर युग में जीवित रहती,
विश्व कविता दिवस पर कह दूँ—
कविता ही मानवता कहती।
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)




