साहित्य

ये होरी रंगों का त्यौहार

बसंत श्रीवास वसंत

लाल गुलाबी धवल सुनहरे, रंगों का है ये मेल,
मिटा रहा है ऊँच-नीच का,जग का सारा खेल।
भीगी चुनर, भींगे हैं चोला,भीगे राधा की साड़ी,
सतरंगी यादों में डूबे, आज जगत के नर-नारी ।

अबीर उड़ा है अंबर तक, महका है सारा गाँव ,
शीतल मंद सुगन्धित हवा,ये फागुन की है छाँव।
झुंड बना के निकली टोली,हुड़दंग मचायो भारी,
मल-मल के मुख ग़ुलाल भईं,सखियाँ हुई बावरी।

झांज मृदंग ढम ढम बाजे, डफली की है झंकार ,
गली-गली में गूँज रही है,होरी फागुन की त्यौहार।
गुझिया-पापड़ की खुशबू,और चढ़ी भाँग खुमारी ,
झूम रहें हैं जीव जगत के, हर्षित हैं सब नर-नारी।

लाल गुलाबी रंगों से गलियां, भींग रहे रंग चहु ओर
रंग डाल डाल के ग्वाल बाल,संग कान्हा मचाए शोर
कान्ह छबीले मोहन मुरली, तान सुनावत मदमाती है ,
गोपियन की टोलिन में देखो, प्रेम-पियूष की थाती है ।
*
बाँटत हैं सब नेह परस के, छोड़ मन की गाँठ उघार,
बना मन प्रेम का उपवन,करे सिंचन प्रीत की फुहार।
​पिचकारी की धार चले हैं,और उड़ाते गुलाल अबीर,
खुशियों से भर जाए आज, हरेक निर्धन की तकदीर।
*
तार ह्रदय में झंकृत होते , गूँजती खुशियों का गान,
रंग उत्सव के दीप जलाकर,ये जग का हो कल्याण।
चलो बाँटते जाएँ जग में, हम सबको अपना प्यार,
मुबारक हो सभी आप को,ये प्यारा रंगों का त्यौहार।।

बसंत श्रीवास वसंत (नरगोड़ा)
रामकृष्ण मिशन नारायणपुर छत्तीसगढ़

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