
कहना आसान है कि हम दे देंगे प्यार की परीक्षा…
पर न दे सकेंगे सीता सी परीक्षा,
न कर पाएंगे राधा सा त्याग… न झेल पाएंगे दुख दुनिया के…
जैसे सीता ने प्यार के लिए दी अग्निपरीक्षा, फिर भी कामयाब न हो पाईं…
काटे जीवन वन में उन्होंने पत्नी धर्म के साथ, फिर भी न पा पाईं साथ राम का…
(सीता)… पर कैसे भूल जाएं उस राम को जिसने सीता के लिए धरती पर सोए, रावण से लड़े!?
जैसे राधा ने निस्वार्थ प्रेम किया कृष्ण से पर पा न पाईं उनको…
फिर भी आशा न छोड़ी उन्होंने, कष्ट सहे, आँसू बहाए…
फिर भी,
फिर भीiii
जब मिला राधा को श्राप कि बढ़ाया एक कदम तुमने कृष्ण की ओर तो तुम संसार में अपवित्र कहलाओगी…
न सुनी बात उन्होंने जगत की,
बढ़ाया कदम और हो गई प्रेम में अपवित्र ही सही…
न छोड़ा उन्होंने प्यार करना,
सबको जताया उन्होंने कितना था गहरा प्यार उनका…
वैसे ही,
वैसे ही,
आज मैं कहना चाहती हूँ,
कैसे भुला दूँ उस प्रेम को मैं जिसने इन होठों पर खुशियाँ ला दी…
कैसे भुला दूँ उस प्रेम को मैं जिसने जीने की वजह सिखा दी…
मैं जानती हूँ, मैं न हूँ,
सीता सी साफ़,
राधा सी कोमल,
बस एक प्रेम जाल में फंसी कठपुतली हूँ,
जिसकी ली जा रही है परीक्षा,
मुझे समय की मार ने फंसाया है अभिमन्यु सा…
न रो सकती हूँ उर्मिला की तरह,
न मौत आती अश्वत्थामा की तरह…
आज खुद से नफरत करने लगी हूँ,
खुद के प्रेम को तरसने लगी हूँ,
न रो पाती हूँ, न सो पाती हूँ,
ऐसी फंसी हूँ इस प्रेम जाल में, न ताकत बची है मुझमें मीरा सी अब, ये सब झेल के भी मुस्कुरा दूँ अब…
ये प्रेम जाल की परीक्षा है…
ये प्रेम जाल की परीक्षा है…
रिया राणावत
कालीदेवी , झाबुआ (मध्य प्रदेश)



