साहित्य

युद्ध की विभीषिका

साधना मिश्रा विंध्य

(१)
जब रणभेरी गूँज उठी, छा गया दिशाओं में हुंकार,
काँप उठा तब धैर्य धरा का, डोल उठा संसार।
वीरों का रक्त भले लिख दे इतिहासों में जयकार,
पर पीछे छोड़ जाता है युद्ध करुण पुकार।

(२)
युद्ध की ज्वाला जब जलती, जलता धन-भंडार,
सूख जाते हैं खेत, बिखर जाता व्यापार।
सिक्कों की खनक दब जाती तोपों के प्रहार,
एक युद्ध हर लेता है पीढ़ियों का संचार।

(३)
उजड़ गए घर-आँगन सारे, टूटे स्नेह के तार,
माँ का आँचल भीग गया, खोया बहनों का श्रृंगार।
नन्हे बच्चे पूछ रहे हैं “कब लौटेंगे द्वार?”
युद्ध सदा ही देता है पीड़ा को विस्तार।

(४)
सूने पड़े बाजार सभी, बुझे सपनों के द्वार,
करुण क्रंदन गूंजता, गया मित्र व्यवहार।
जहाँ गूँजती थी समृद्धि की मधुरिम झंकार,

लिख जाता है युद्ध वहां पर पीड़ा का संसार।

(५)मौन पड़े ज्वालाएँ सारी, थम जाए संहार,
मानवता के हित में फैले फिर से शांति अपार।
रुक जाए रक्तिम पथ पर बढ़ता यह प्रहार
विंध्य की विनती रघुवर! करुणा दृष्टि अपरंपार,
युद्ध-विभीषिका से रक्षा कीजिए बारम्बार।

साधना मिश्रा विंध्य

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