
नित नशे में चूर है,
मानवता से दूर है,
कहते मेरा क्या कसूर है|
हम तो सीधे सादे मुर्ख है||
जेब में अठन्नी खर्चा रुपया ढेर है,
देख गरीबी मुख फेर है,
अपनों से प्रिय लगते गैर है|
कहते क्या समझे हमको मुर्ख है ||
राम नाम भले सस्ता,
फिर भी जपने में हालत खस्ता,
भूले भटके चले रास्ता|
बुद्धि फिरे होते मुर्ख है||
आते सदा अप्रेल फूल है,
फिर भी दिमाग पर धूल है,
समझे न समय का मूल है,
बनाते सबको मुर्ख है||
पायल अग्रवाल’छनक’
मुजफ्फरपुर
बिहार




