
तुम से मिलकर ये वक्त गुजर जाता है
दो घड़ी के लिए ये वक्त किधर जाता है।
ढ़ूँढ़ता हूँ मैं ख़ुद को ख़ामख़ा तुझ में
देख कर तुझ को मैं बिखर जाता हूँ।
सोचता भी मैं नहीं के कल क्या गजब हो
आदत सी हो गयी है मैं उधर जाता हूँ।
हो गया है प्यार मुझे तुम से जानम
बेवज़ह ही मैं ख़ुद से सिहर जाता हूँ ।
पाँव मेरे दो कदम बढ़ते भी नहीं हैं
कह नहीं सकता के मैं क्यूँ ठहर जाता हूँ।
मंजुला शरण “मनु”
राँची झारखण्ड़।



