साहित्य

हां देखूंगी तेरी राह

रिया रणावत

दिल तो लाखों के टूटते हैं, अपने तो बहुत बिछड़ते हैं…

आज यहाँ कल वहाँ गैरों की गलियों में,
हँसी ठिठोली करते मिलते हैं…
मैं रोती हूँ ये सब देख के, और डर भी जाती हूँ,
जाने क्यों समझ नहीं आता…

कि ये दिखावा करने करीब आते हैं,
और मन भर कर लौट जाते हैं…

काश पहले पता होता ये, दिल ना लगाती…
काश पहले पता होता ये, उसकी बनती नहीं जाती…

लोग बोलते हैं कि, तुम्हारे मरने तक साथ निभाऊँगी,
किसी और की ना हो जाऊँगी…
मैं कहती हूँ जब तक चाँद है, जब तक आकाश है,
जब तक धरती पर स्वास है, गंगा में पानी, सूरज में रोशनी है…
हाँ जब तक नहीं बदलूंगी रंग अपना,
बन के दिखाऊँगी मैं तेरा अपना…

बनूँगी यमुना जैसा, बनूँगी सूरज जैसा,
ना बदलूँगी रंग ना बदलूँगी ढंग…

ये मालूम होके कि, दिल लाखों के टूटते हैं,
फिर भी मैं कहना चाहती हूँ,
ज्यादा नहीं, दो पल तुम्हारे संग बैठना चाहती हूँ,
अपना थोड़ा प्यार जताना चाहती हूँ…

तुम्हारा हाथ पकड़ के मैदानों में घूमना चाहती हूँ,
ज्यादा नहीं, तेरे हाथों एक सूरजमुखी चाहती हूँ,
तेरे लिए खाना बनाना के अपने हाथों से खिलाना चाहती हूँ…

तू क्या मालूम क्यों डरता है,
तुझे लगता है कि किसी के साथ से तू भटक जाएगा,
और मेरा कहना है कि जब अच्छा साथ हो तो मंजिल दूर नहीं लगती,
जितना उठना ही आसान हो जाता है…

हाँ देखूँगी तेरी राह…
और जब तू मिल जाएगा तो कह दूँगी ये सब जो कहना था मुझे…
हाँ देखूँगी तेरी राह…
हर पल हर स्वास में पुकारूँगी तुझको,
देखूँगी तेरी राह…

— *रिया रणावत*

कालीदेवी, झाबुआ (मध्य प्रदेश)

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