
देवों में देव अकेले हनु जी,दो बार मनाते जन्म दिवस
एक तो कार्तिक चतुर्दशी,दूजी चैत्र पूर्णिमा है यही दिवस
प्रभु नाम में इतने लीन,मगन सुधि तन की रहे नहीं इनको
सागर पार की आई बेला, जामवंत ने याद दिलाई इनको
कनक भूधरा कार शरीरा क्यों भूल गया तन को
है पुण्य दिवस आया अब वह,कर सिद्ध स्वयं के जीवन को
मां अंजनि और पवन देव की सुंदर मह संतान बहुत
बचपन से शक्ति प्रदर्शन करना,आदत में हनुमान बहुत
जिद्दी इतने,उगते सूरज को समझ खिलौना भागे लेने इसको
भयभीत देव सारे नभ में,पवन देव भागे पीछे इनके
इंद्रदेव क्रोधित होकर,किया प्रहार गिरे धरती पर
अनहोनी न होने पाएं कोई, प्रभु शरण में आए विन्यावत होकर,
इंद्रदेव के कोप के कारण धरती पर गिरे पवन सुत ऐसे,
टूटी ठैढ़ी हनु कहलाए, पूजें दास राम का कहकर।।
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अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश




