
मतभेदों की आँधी में भी, जब शीतलता मुस्काती है,
वहीं कहीं मानवता की, सच्ची ज्योति जगमगाती है।
वाणी में चाहे तीखे स्वर, मंचों पर हो तकरार भले,
दुख की घड़ी में हाथ बढ़े—यही संस्कृति कहलाती है॥
सत्ता की सीढ़ी ऊँची हो, या विपक्ष की राह कठिन,
दिल में यदि करुणा जीवित हो, मिट जाते सारे आवरण।
विचारों के रण में योद्धा, पर मन में हो निर्मलता,
यही तो भारत की पहचान, यही हमारी मानवता॥
नहीं यहाँ कोई शत्रु होता, केवल मत का अंतर है,
लोकतंत्र की मर्यादा में, संवादों का समंदर है।
जब पीड़ा में कोई झुकता, दूसरा हाथ बढ़ाता है,
तभी सियासत का आँगन भी, मंदिर सा पवित्र बन जाता है॥
वाणी की आग भड़कती हो, पर हृदय न हो विष से भरा,
संकट में जो साथ खड़ा हो, वही सच्चा पथप्रदर्शक धरा।
यह दृश्य नहीं दो चेहरों का, यह युग का सन्देश महान,
राजनीति अपनी जगह सही, पर मानवता है सर्वोपरि मान॥
जो सीख न ले इस अवसर से, वह राजनीति का क्या ज्ञाता?
जहाँ करुणा का स्थान न हो, वह नेतृत्व भी क्या कहलाता?
आओ मिलकर प्रण ये लें हम, द्वेष न दिल में पलने दें,
प्रतिद्वंद्विता रहे सजीव, पर मानवता न ढलने दें॥
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*




