साहित्य

शक्ति और मर्यादा

डाॅ. अनीता निधि

मर्यादा की जो सीमा है, वह नाम राम का प्यारा है,
अगणित शक्ति का संचय भी, बस राम रूप की धारा है।
जो धनुष हाथ में थामें हैं, वह रक्षक है असहायों का,
जो हृदय करुणा से भरा हुआ, वह शत्रु है दुराचारों का।
​ राजपाट को तजकर जिसने, वन का पथ अपनाया था,
पितु-वचन की खातिर जिसने, सुख-वैभव ठुकराया था।
शबरी के जूठे बेर खाए, मर्यादा को सम्मान दिया,
बिना भेद-भाव के जग में, सबको अपना स्थान दिया।
​जब सत्य डगमगाने लगता, तब कोदंड की टंकार उठी,
सागर की छाती कांप गई, जब प्रभु की भृकुटी एक चढ़ी।
अहंकार के ऊंचे पर्वत को, चरणों से जिसने रौंद दिया,
लंकापति के दस शीशों को, निज बाणों से बेध दिया।
​शक्ति वही जो संयम में हो, मर्यादा जिसका शासन हो,
राम वही जो भीतर जागे, सत्य का जिसमें आसन हो।
नमन है उस अवतार को, जो धर्म की साक्षात मूरत है,
राम नाम ही इस युग में, शांति की पावन सूरत है।

माता का सजा दरबार

माता का सज गया है दरबार, उजेरा हो गया है,
माता के चरणों में मेरा अब बसेरा हो गया है।

सजाया है माता तेरा सिंहासन, तुम आकर विराजो यहाँ,
चढ़ाऊं फल, फूल, मेवा, तेरे दर का फेरा हो गया है।

तेरे माथे मैं माता तुझे लाल चुनर ओढ़ाऊं ,
जली जोत तेरे आशीष की दूर अंधेरा हो गया है।

मची है धूम जगत में बासंतिक नवरात्रि त्योहार का ,
मां अंबे तेरी आभा का चतुर्दिक घेरा हो गया है।

मन हुआ मेरा हर्षित, पुलकित हुआ है यह संसार,
सारे जगत में खुशियों का डेरा हो गया है।

करो दुष्टों का संहार, हारो मां जगत का अंधकार,
तेरी कृपा से जग का दूर तम घनेरा हो गया है।

‘निधि’ के मन को भाने वाली, करो तुम सब का उद्धार
आशीष पाने को तेरे चरणों में ही घर मेरा हो गया है।

डाॅ. अनीता निधि जमशेदपुर,झारखंड

 

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