
ये रविवार क्या होता है,
थकी साँसों की राहत होता है।
छह दिनों की दौड़ के बाद,
मन का सुकून, इबादत होता है।
सुबह देर से आँखें खुलें,
अलसाया सा हर एक ख्वाब होता है।
अलार्म भी चुप रह जाता है,
घड़ी का भी विश्राम होता है।
चाय की चुस्की, अख़बार संग,
हर लम्हा कुछ खास होता है।
परिवार संग हँसी-ठिठोली,
रिश्तों का एहसास होता है।
बच्चों की शोर भरी किलकारी,
घर आँगन गुलज़ार होता है।
माँ के हाथों का स्वादिष्ट खाना,
दिल को छू जाने वाला प्यार होता है।
कुछ सपनों को फिर से सोचें,
कुछ अधूरे कामों का ध्यान होता है।
कभी पूजा, कभी प्रकृति संग,
आत्मा का संवाद होता है।
शाम ढले जब सूरज थक जाए,
मन भी अगले सफ़र को तैयार होता है।
रविवार यूँ ही सिखा जाता है,
जीवन में संतुलन भी ज़रूरी होता है।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश
मौलिक अप्रकाशित रचना




