साहित्य
है बसंती शोर

अब पवन शीतल सुहाना, फैलता चहुँओर।
पेड़ पादप झूमते नित, है बसंती शोर॥
ऋतु बसंती है सुहानी, बज रहे हैं साज।
थाप ढोलक पर लगा कर,खुश हुये सब आज॥
सूर्य का आलोक फैला, हो गयी है भोर।
पेड़ पादप झूमते नित, है बसंती शोर॥
कोकिला वन में पुकारे, अब भ्रमर है बाग।
अब पपीहा बोलता है, रोज मीठे राग॥
रश्मियाँ फैला रहा है, सूर्य प्राची छोर।
पेड़ पादप झूमते नित, है बसंती शोर॥
पुष्प बागों में खिलें हैं, लाल पीले सब्ज।
दृश्य सुन्दर है सुहाना, खिल गये हैं नब्ज॥
मौसमी फाल्गुन बसंती, नित्य नाचे मोर।
पेड़ पादप झूमते नित, है बसंती शोर॥
खेत में सरसो खिले हैं, रंग पीले साज।
हैं सुगंधित पुष्प सारे, अब कली को लाज॥
तितलियाँ अब डोलती हैं, बाग में हर ओर।
पेड़ पादप झूमते नित, है बसंती शोर॥
डॉ॰ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश



