
शाम-ओ-सहर न देख कभी यामिनी न देख।
इक शम्अ को जला ले घनी तीरगी न देख।
दिलकश नज़ारा ज़िस्त में मिलता नसीब से,
ये हुस्न लाजवाब इसे सरसरी न देख।
ये लोग क्या कहेंगे उन्हें कहने दे जरा,
बढ़ते क़दम को बढ़ने दे शर्मिन्दगी न देख।
ख़ुशहाल ही रहेगी सदा जिन्दगी तेरी,
जो भी ख़ुदा ने दे दिया उसमें कमी न देख।
*अम्बुज* भरा पड़ा है ये ख़ुदग़र्जों से जहाँ,
इंसाफ़ की लड़ाई में तू दोस्ती न देख।
चनरेज राम अम्बुज



