बन गये कैदी सभी,दल कौरवों का पिटने लगा,
दरम्यानें गंधर्व – कौरव, जंग जो छिड़ने लगा।
दिल पसीजा अर्जुन का जब,भीम भी कहने लगा,
बात है यह कुरुवंश का, सम्मान मर्दन होने लगा।
दी सिकस्त गन्धर्वों को जा,उनका खेमा जलनेंलगा,
हुए कैद से आजा़द,ध्वज कुरुवंश का दिखने लगा।
कौरवों का मन था लज्जित,जो वहाँ पे गिरनेलगा।
अहसान फरामोशी की बातें,गिर्द उनके होने लगा।
अज्ञातवास है पूरा नहीं,दुर्योधन भी ये कहने लगा,
थे पितामह भी वहाँ,सवाल उनसे, यह होने लगा।
फैसला था वह बुजुर्गी,जोतीखा उन्हें लगने लगा,
पूरा हुआ अज्ञात काल,गवाही चाँद भी देने लगा।
घटा बढी़ दिनों की जो, निगाहों पे आ टिकने लगा,
चाँद के हिसाब से जो देखो,मलमास है लगने लगा।
✍️ चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन”
चलभाष ९३०५९८८२५२




