
अय मेरे बचपन तुँ वापस घर आ जा
मुझसे रूठ कर। तुँ हमसे दूर मत जा
ये यौवन है गम का गहरा एक खजाना
पचपन तक है जग संघर्ष का जमाना
कितना सुन्दर था वो पल वो रंगीन नजारा
हरा भरा लगता था तब अपना जीवन सारा
खेल खेल में बीत जाता था दिन रात प्यारा
रईसजादा बन दीख जाता था रुतवा हमारा
पल में लड़ लेना पल में रुठना मान जाना
गुस्से में दोस्ती तोड़ कर पुनः मित्र बन आना
संघर्ष से दूर था वो मस्ती भरी गीत तराना
ना था कोई भी दुश्मन ना किसी से डर जाना
पाठ याद ना करने पर गुरूजी से पीट जाना
स्कूल में मूरगा बन कर गलती मान जाना
बार बार सर में दर्द का बहाना बना समझाना
आनंद ही आनंद था वो बचपन का घराना
आटा चावल की कब थी कोई भी कहीं चिन्ता
शेरदिल बन जाने की नहीं थी कोई हीनता
खुद का था राजा खुद का था बना राजकुमार
शिकचिलिया बन कर लगाते थे राज दरबार
रूठना और मनाना था कितना ही वो। आसान
नाटक में बन जाते थे पगड़ी बाँध दीन किसान
पतंग उड़ाना पतंग कटने पे बवाल मचाना
मस्त था मनमौजी का वो लड़कपन का जमाना
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार



