साहित्य

दिखावा

जयचन्द प्रजापति 'जय'

दिखावा का अस्तित्व
कई साल नहीं चलता है
कुछ समय के बाद
एकदम शून्य अवस्था में
डाल पर अटक जाता है

दिखावे में अस्थिरता
एक अनावश्यक हाव-भाव
एक बोझ की तरह होता है
जो थका देता है
व्यक्ति इस बोझ को
मंजिल तक नहीं ले जा सकता है

वहीं सादगी
भले सीधी-सादी हो
वोझ रहित होती है
सादगी बेचारी कभी थकती है
पूरी मंजिल
आच्छादित कर लेती है
….
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

कविता का भावार्थ… यह कविता दिखावे और सादगी के बीच गहरा विरोधाभास दर्शाती है। दिखावा क्षणभंगुर और अस्थिर होता है, जो कुछ ही समय बाद शून्य हो जाता है और डाल पर अटककर रुक जाता है। यह एक अनावश्यक बोझ की भांति व्यक्ति को थका देता है, जिसे मंजिल तक पहुंचाना असंभव हो जाता है।

इसके विपरीत, सादगी सरल और बोझरहित होती है; वह कभी थकती नहीं और पूरी मंजिल को सहजता से आच्छादित कर लेती है। कुल मिलाकर, कवि सादगी की शाश्वत शक्ति को दिखावे की नश्वरता पर विजयी बताते हैं।

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